उनके हर वार हम, मुस्कुरा कर सह गये
जब भी टूटा दिल, हम हंसते रह गये ॥
क़भी ज़ुबाँ से इकरार मुमकिन ना था
जो मिली आँखों से आँखें, सब कह गये ॥
इश्क़ है मग़र, ग़ुरूर भी है ख़ुद पर
लफ़्ज़ फ़ना हुए, सिर्फ़ जज़्बात रह गए ॥
काका मौत चखियो, ते ना चखिए इश्क़
इश्क़ के मारे कितनी सहीं बात कह गए ॥
अर्मां सारे, उनके इश्क़ में ज़िंदा रहने के
ज़िंदगी थम गयी, अर्मां वहीं रह गए ॥
सुबूत ए सुकून नहीं है हमारा मुस्कुरा देना
मेरा सब्र मेरे तमाम मुजाहिदात कह गये॥
क्यों सोचता है इमकान-ए-हाँ के मनाज़िर “अब्दाल”
उन्हें कहना था ना, वो सिर्फ़ “ना” कह गये ॥